22/8/2008
जो जैन सन्त अपने आपको हिन्दू मानते हैं वे अपने साथ जैन शब्द जोडना बन्द करें !
जैन संस्कृति का पतन चाहने वाले कट्टर हिन्दुत्ववादियों से सांठसांठ कर अपने व्यक्तिगत हित साधने और अपना रूतबा गांठने के लिये अपने मत में अनुयायियों की तादाद बढाने मात्र के लिये जैन संस्कृति के कुछ सन्तों, साधु-सन्यासियों ने हिन्दुओं में से मांस-मदिरा का सेवन करने, जमाखोरी, कालाबाजारी व अन्य अनैतिक समाज विरोधी कार्यों में लिप्त कुछ जमातों को अपने मत-पंथ में एक नई गोत्र देकर शामिल किया जा रहा है। ये नव घोषित जैनी न तो जैन संस्कृति के संस्थापक एवं राष्ट्रपुरूष ऋषभदेव के मानवधर्मसूत्र में वर्णित निर्देशों का पालन करते हैं और न ही जैन संस्कृति के दर्शन एवं सिद्धान्तों के अनुसार आचरण करते हैं। कोढ में खाज यह है कि वे जैन संस्कृति में भी विश्वास नहीं करते हैं। जैन संस्कृति में शामिल किये जा रहे इन नवजैनों का आचरण पूरी तरह जैन संस्कृति के खिलाफ है और इनका काम जैन संस्कृति के अनुयाइयों में दुराव पैदा करना और फूट डलवाना मात्र है, जैसा कि कट्टर हिन्दुत्ववादी चाहते हैं। ये नवजैन जमातें आज भी जमाखोरी कालाबाजारी, टैक्स चोरी, अनाचार, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार, उनके शोषण सहित गैर कानूनी, समाज विरोधी कार्यों में लिप्त है। नतीजन इनकी करतूतों का खमियाजा जैन संस्कृति के अनुयाईयों को भुगतना पड रहा है। जैन संस्कृति की बदनामी हो रही है।
सबसे गम्भीर चिन्ता का विषय तो यह है कि इस तरह की जैन संस्कृति विरोधी हरकतों के लिये जुम्मेदार जैन सन्त, साधु-सन्यासियों को जैन संस्कृति एवं उनके इतिहास का क-ख-ग भी मालूम नहीं है। अधिकांश ने जैन संस्कृति के 5500 साल पुराने इतिहास, दर्शन और राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्थाओं का कभी अध्ययन ही नहीं किया। 80 फीसदी साधु-सन्यासियों को तो यह भी पता नहीं है कि वे हिन्दू हैं या जिनशासन का हिस्सा जैन ! इन साधु-सन्तों का काम है, अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति, अपने सम्मान का दिखावा करने के लिये जैन उपासना स्थलों, आराधना स्थलों को हिन्दुवादी नेताओं-नौकरशाहों की भाषणस्थली बना कर उनके जरिये अपने सीधे-साधे अनुयाइयों पर रूतबा गांठना और अपने कुछ पूंजीपति अनुयाइयों को आर्थिक लाभ पहंुचवाना ! ताकि ये पूंजीपति इन संतों-साधु-सन्यासियों के प्रचार-प्रसार के लिये नोटों की थैलियां खोल सकें। ये साधु-सन्यासी यह जानते हुये भी कि उनके पूंजीपति चेले जो धन उन पर लुटा रहे हैं, वह आम जनता का शोषण कर, उनके खून से रंगा धन है। जिनका उपयोग करना जैन संस्कृति के दर्शन-सिद्धान्तों के सख्त खिलाफ है और जैन संस्कृति का अपमान है ! बावजद इसके ये स्वार्थी इस काले धन के बूते पर अपना रूतबा बनाने में मशगूल हैं।
ऐसे आडम्बरधारी, पोंगापंथी हिन्दुवादी सन्यासियों से साफ-साफ यही कहना है कि वे तत्काल अपने आचरण पर अनुशासन की कठोर लगाम लगायें, अपने आप को जैन संस्कृति के आदर्शों-सिद्धान्तों और जैन संस्कृति के संस्थापक राष्ट्रपुरूष ऋषभदेव के मानवधर्मसूत्र में निर्देशित नियमों आदेशों-निर्देशों का पालन करें अन्यथा अपने साथ जैन शब्द जोडना बन्द करें। जैन सन्त गम्भीरता से विचार मंथन करें और निर्णय लें !
जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट