27/8/2008
पर्युषण महापर्व का अपमान मत करो !
आज से श्वेताम्बर समाज के पर्युषण पर्व प्रारम्भ हो रहे हैं। इस पावन पर्व की शुरू करने की तिथियों में भी श्वेताम्बर जैन समाज के विभिन्न धडों में मतभेद हैं। कुछ ने 27 अगस्त से प्रारम्भ कर दिये तो कुछ 28 अगस्त, 2008 से प्रारम्भ करेगें दिगम्बर जैन समाज दसलक्षण पर्व आगे सम्भवत: 5 सितम्बर, 2008 से प्रारम्भ करेगें। यह अपने आप में एक पीडादायक स्थिति है और जैन समाज मे फूट की स्पष्ट प्रतीक है। शर्मनाक स्थिति तो यह है कि श्वेताम्बर समाज का एक हिन्दुत्ववादी पूंजीपति वर्ग, जिसके हाथ में समाजों की बागडोर है, जैन समाज के इस पावन पर्व के शुभारम्भ के अवसर पर उन हिन्दुओं को मुख्यअतिथि के रूप में बुलाकर उन से जिनशासन के स्वाभीमान की प्रतीक केसरिया पताका का ध्वजारोहण करवा रहे हैं, जो जिनसंस्कृति के बारे में क-ख-ग भी नहीं जानते हैं। वे ही नहीं उनकी पिछली सात पीढियां भी जिन संस्कृति के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। क्या जैन समुदाय में एक भी विद्धान नहीं है जो जैन संस्कृति की पताका सम्भाल सके ? क्या हक है इन हिन्दुत्ववादी बेशर्म-गैर जुम्मेदार पूंजीपतियों को ऐसे पावन पर्व पर हिन्दुओं से हमारे सांस्कृतिक पर्व में अगुआई करवाने की ? क्यों ये पयुर्षण महापर्व का अपमान करते हैं ?
हम आगे लिखेगें कि क्यों जिनसंस्कृति के दुश्मन पूंजीपति, हिन्दुओं से, जैन समाज के आराधना स्थलों का अपने आर्थिक फायदे के लिये दुरूपयोग कर भाषण-उदघाटन के बेशर्मीपूर्ण कार्यक्रम करवाते हैं। इससे पहिले पढिये उस पत्र को जिसे 16 सितम्बर, 1998 को आचार्य श्री महाप्रज्ञ चातुर्मास प्रवास समिति, सरदारशहर-331403 के श्री सुमति गोठी ने राष्ट्रीय सचिव, जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट को लिख था-

इस पत्र को लिखे 8 साल हो गये। सम्माननीय आचार्य महाप्रज्ञ जी ने जैन समाज को जाग्रत और संगठित करने का मुददा उठाया ! लेकिन पिछले आठ सालों में इस मुददे पर उनने स्वंय ने क्या किया ? चिन्तन करें आचार्य महाप्रज्ञ जी। हमारा उनसे एक निवेदन है कि शरीर क्षण भंगुर है, संस्कृति नहीं ! शरीर नाशवान है, संस्कृति प्रफुल्लीत होती रहती है ! अब वक्त थोडा ही बचा है, जैनसंस्कृति को पल्लवित करने के लिये ! ठोस प्रयास तत्काल शुरू कीजिये ! क्रमश:
जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट