28/8/2008
स्टेट गेस्ट-राज्यकीय अतिथि का दर्जा त्यागें जैन सन्त !
श्वेताम्बर जैन समाज के एक हिस्से तेरापंथ मत के आचार्य श्री महाप्रज्ञ को स्टेट गैस्ट का दर्जा देने के बाद अब दिगम्बर जैन समाज के सन्त मुनि पुलक सागर को राजकीय अतिथि का दर्जा देने की भाजपानीत राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने उदयपुर में द्योषणा की है। मुख्यमंत्री लगता है कि जैन संस्कृति की अस्मिता को अक्षुण्ण रखने हेतु जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का निर्णय लेने के बजाय कुछ सन्तों को स्टेट गैस्ट का दर्जा देकर जैन समुदाय के विद्यटन की खाई चौडी कर वोट बटोरने में विश्वास रखती है। भाजपा की तो यह फिदरत रही है। जैन संस्कृति में जब व्यक्ति सन्यास लेता है तो वह सांसारिक रिश्ते-नातों, जुम्मेदारियों, आडम्बरों सहित समस्त सांसारिक सम्बन्धों का त्याग कर अपने जीवन को जिन संस्कृति को समर्पित कर देता है। सबकुछ त्याग देने के बाद प्राप्ति के लिये चाह का तात्पर्य है कि व्यक्ति में त्याग का संकल्प लेने में कोई कमी रह गई है। हम इन सन्तों से यह जानना चाहते हैं कि स्टेट गैस्ट या राजकीय अतिथी का दर्जा प्राप्त कर वे जिन संस्कृति के अनुयाइयों को क्या दर्शाना चाहते हैं ? क्या संदेश देना चाहते हैं ? यही कि से हिन्दुत्ववादियों के आधीन हैं या यह कि उनके त्याग-सन्यास ग्रहण करने के संकल्प में कोई कमी रह गई है ! क्योंकि त्याग में प्राप्ति का कोई स्थान नहीं है।
हम इन प्रबुद्ध विद्वान सन्यासियों से एक ही आग्रह कर सकते हैं कि उन्हें स्पष्ट समझ लेना चाहिये कि जैन संस्कृति में सन्यास लेने के बाद प्राप्ति की इच्छा के लिये कोई स्थान नहीं है। अगर जैन संस्कृति के किसी ग्रन्थ में उल्लेख हो तो बतायें अन्यथा स्टेट गैस्ट-राजकीय अतिथि के दर्जे का त्याग करें सन्त ! क्योंकि आप जैन संस्कृति की धरोहर हैं और यह धरोहर आम अवाम की है आप आम अवाम के हैं, किसी राजा-रजवाडे या सामन्ती सरकार के नहीं ! त्याग के बाद प्राप्ति जैन संस्कृति का अपमान है और त्याग को कलंकित करता है।
जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ्रण्ट