जैन समाज सक्षम क्रान्तिकारी संघर्ष हेतु अग्रसर हो !
आज से 2800 वर्ष पूर्व जैन संस्कृति पूरे जम्बूद्वीप (एशिया महाद्वीप) में पूरे यौवन पर रही है और पूरे क्षेत्र में "जिन शासन" का नियन्त्रण रहा है। अगर हम इतिहास का गौर से अध्ययन करें तो अहसास होगा कि पूरे जम्बूद्वीप (कालासागर से हिन्द महासागर तक का वर्तमान एशिया महाद्वीप क्षेत्र) में जिन शासन (जैन संस्कृति) का सक्षम संगठित और अनुशासित गणतांत्रिक साम्राज्य था, जिसमें अल्पसंख्यक वैदिक संस्कृति के अनुयाईयों को इस तरह पल्लवित होने का अवसर मिला मानो वे पूरे तन्त्र की आत्मा हों। कालान्तर में महावीर के परिनिर्वाण के 500 साल बाद दो सहोदर आचार्यों, (दोनों सगे भाई होने के साथ-साथ एक ही गुरू द्वारा दीक्षित गुरू भाई) आचार्य भद्रबाहु व आचार्य स्थूलभद्र के निजी मतभेदों के कारण जैन समाज दो भागों में विभक्त हुआ और विखण्डन की यह प्रक्रिया पिछले 2035 वर्षो से निरन्तर चालू है और एशिया महाद्वीप की तो बात ही छोड दें, वर्तमान भारत गण्तन्त्र में जैन संस्कृति के अनुयाइयों की आबादी देश की आबादी का मात्र 0.40 प्रतिशत ही रह गई है। इस अल्पमत आबादी के बावजूद जैन संस्कृति के अनुयाइयों ने देश की आर्थिक प्रगति में अपने योगदान का बेमिसाल वर्चस्व कायम रख है। जैन संस्कृति के अनुयाई अपनी विशिष्ट पहिचान के साथ देश की प्रगति में सदैव अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। बावजूद इसके, आज अतिवादी हिन्दू संगठन हमारी अतिप्राचीन जैन संस्कृति को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं और अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिये पूर्व नियोजित योजनाबद्ध तरीके से जैन समुदाय पर अत्याचार करने का क्रम चला रहे हैं और पिछले दस सालों से जैन समुदाय पर अत्याचारों की घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
बन्धुओं, राजस्थान को ही लें, प्रदेश के दक्षिणी पश्चिमी क्षेत्रों में खास कर उदयपुर, सिरोही, जालौर, पाली आदि जिलों में कथित हिन्दूवादी अतिवादी संगठनों द्वारा जैन संस्कृति पर हमले तेज कर दिये गये हैं। जहां तक जैन सांस्कृतिक धरोहरों का सवाल है, इन्हें अपने हाल पर नष्ट होने के लिये छोड दिया गया है। फिलहाल एक उदाहरण लें-- चित्तौडगढ जिला मुख्यालय पर स्थित रणथम्भौर किले के परिसर का। वहां स्थित जैन कीर्ति स्थम्भ एवं सलग्न स्मारकों की अत्याधिक जर्जर हालत होते हुये भी उसके जीर्णोंधार की जानबूझ कर कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है। जैन संस्कृति से जुडे गुजरात सहित देश के अन्य राज्यों के जैन ऐतिहासिक स्थलों का भी कमोबेश यही हाल है। हिन्दुत्ववादी उन पर अतिक्रमण कर रहे हैं, शासन-प्रशासन मौन है।
राजस्थान सहित देश के अन्य राज्यों में क्रमबद्ध रूप से जैन मंदिरों में मूर्तियों की चोरियां आम बात हो गई है। जैन आराधना स्थलों में पुलिस व प्रशासन का गैर कानूनी हस्तक्षेप अपनी सारी सीमायें लांघ चुका है। सत्ता के सानिध्य में पनप रहे अतिवादी संगठनों द्वारा जैन संस्कृति के अनुयाइयों के खिलाफ हमले तेज हो रहे हैं। अलवर दीक्षा प्रकरण, बालोतरा दीक्षा प्रकरण, भीनमाल मुनि श्री प्रकरण एवं उसके बाद की घटनाऐं, जालौर में अष्टापद मूर्तियों के खण्डित करने, उदयपुर के केसरिया नाथ में जैन समाज पर हिन्दुवादियों के हमलों सहित जैन समुदाय के लोगों की सम्पत्ति को नष्ट करने व नुकसान पहुंचाने के ऐसे सैंकडों प्रकरण हो चुके हैं और हो रहे हैं, जिनसे साबित हो गया है कि जैन संस्कृति के (संख्या में अल्पसंख्यक) अनुयाइयों का भारत गणतन्त्र में शान्तिपूर्ण जीवन यापन दुश्कर बनाया जा रहा है।जैन समाज पर हो रहे अत्याचारों में दोष हमारे उन तथाकथित अगडों-मुखियाओं का भी उतना ही है जितना अतिवादी हिन्दू संगठनों का है। जैन समाज के ये कथित मुखिया पूंजीपति, सेठ-साहूकार, सत्ता के दलाल हैं। अपने नीहित व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिये और सत्ता में अपनी पहुंच बनाये रखने के लिये कुछ सीधे-साधे सन्तों की आड लेकर जैन समाज को मतों-पंथों में विभक्त कर दौलत के बूते पर समाज प्रमुख बने बैठे हैं। उनकी अगली पिछली सात पीढियों को विश्व की अग्रणी जैन संस्कृति के विशाल इतिहास का क. ख. ग. भी मालूम नहीं है। इनका काम तो जैन आराधना स्थलों को हिन्दूवादी राजनेताओं-अधिकारियों की भाषण स्थली के रूप में उपयोग कर अपने निजी आर्थिक हितों की पूर्ति करना मात्र है। इन तत्वों ने कभी भी जैन समाज के समग्र विकास और अपने समाज को भारत गणतन्त्र के संविधान प्रदत्त अधिकार दिलवाने के बारे में सोचा तक भी नहीं है।
बन्धुओं, जैन यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रण्ट का स्पष्ट मानना है कि आज जैन संस्कृति के अनुयाइयों पर जो अत्याचार किये जा रहे हैं, उनके पीछे तथाकथित अति हिन्दूवादी ताकतों की साजिश स्पष्ट है कि प्राचीन जैन संस्कृति तथाकथित हिन्दूवाद में येनकेन प्रकेरण विलीन हो जाये। अब समग्र जैन समाज इस दोराहे पर आकर खडा हो गया है कि जहां से, एक रास्ता जैन संस्कृति को विलुप्त होने और इतिहास का एक अतीत मात्र बनाने के लिये लावारिस छोडने का मार्ग है और दूसरा मार्ग, जैन संस्कृति को संघर्षमय पथ पर चलते हुये अक्षुण्ण रखने का !
बन्धुओं, जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट ने संघर्षपथ पर अग्रसर हो कर जैन संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का दृढ नैतिक संकल्प लिया हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में नगा, लुशाई, बोडो, गोरखा, उत्तराखण्ड, झारखण्ड के नाम पर पूर्वांचल के आदिवासी, पहाड के लोग अपनी अलग पहिचान अक्षुण्ण रखने के लिये सार्थक संघर्ष कर रहे हैं, अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिये हजारों कुर्बानियां दे सकते हैं, तो जैन संस्कृति के अनुयायी अपनी अलग सांस्कृतिक पहिचान को भारत गणतन्त्र के दायरे में रह कर अक्षुण्ण रखने के लिये संघर्ष क्यों नहीं कर सकते हैं ?
जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट की पहली मांग यही है कि जैन संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिये भारत गणतन्त्र के संविधान की धारा 25 से 30 के निर्देशों को केन्द्र सरकार तत्काल प्रभावी रूप से लागू करे, ताकि जैन संस्कृति और जैन समाज पर हो रहे अत्याचारों पर प्रभावी ढंग से अंकुश लगे।
आइये जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट के साथ मिलकर हम अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का सक्षमता से मुकाबला करने और अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों की प्राप्ति के लिये सक्षमता से संघर्ष के लिये अग्रसर हों। आपके सुझाव, आपकी समस्याऐं और इस संघर्ष में आप जैन यूनाईटेड लिबरेशन फ़्रण्ट को किस तरह का सहयोग कर सकते हैं, कृपया julfinfo@yahoo.in पर मेल करें।
क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ !
जैन यूनाईटेड लिबरेश फ़्रण्ट